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प्रशांत किशोर के मास्टर स्ट्रोक से बिहार में किसका गिरेगा विकेट! किस पार्टी में ज्यादा बेचैनी है?

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पटना. चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (Political Strategist Prashant Kishor) के बिहार की सक्रिय राजनीति (Bihar Politics) में आने के संकेतमात्र से ही गर्माहट पैदा हो गई है. अगर प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में आते हैं तो फिर क्या होगा? बीते कई दिनों से प्रशांत किशोर पटना में कैंप कर रहे हैं. उम्मीद है कि 5 मई को या इस सप्ताह के आखिर में प्रशांत किशोर उर्फ ‘पीके’ बड़ा ऐलान करेंगे. पीके पर बिहार ही नहीं दिल्ली की मीडिया की भी नजर है. पीके पटना में बैठ कर दिल्ली की राजनीति को बड़ा संकेत देने जा रहे हैं. कई राजनीतिक पार्टियों ने भी पीके को लेकर प्रतिक्रियाएं दी है. ऐसे में अब सभी को इंतजार है कि पीके की राजनीतिक पारी शुरू होने के बाद बिहार का राजनीतिक समीकरण क्या होगा? पीके के राजनीतिक पार्टी का गठन करने के बाद बिहार में किस गठबंधन को नुकसान और किस गठबंधन को फायदा होगा?

गौरतलब है कि देश के सबसे गरीब राज्यों में से एक बिहार राजनीतिक तौर पर शुरू से ही सबसे ज्यादा मजबूत रही है. कहा जाता है कि अगर एक बिहारी की राजनीतिक समझ को भांप लिया तो देश की राजनीतिक मिजाज को समझने में आसानी होती है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि हर तरफ से निराश हो जाने के बाद प्रशांत किशोर अब सियासी समंदर में डुबकी लगाने जा रहे हैं. उम्मीद है कि 5 मई को पीके की संभावित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई सवालों का जवाब मिल जाएगा.

पीके के जन सुराज पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी बड़ा बयान दिया है.

PK को लेकर किसमें बेचैनी है?

पीके के जन सुराज पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी बड़ा बयान दिया है. नीतीश कुमार ने कहा है कि पीके की राजनीतक गतिविधियों से मेरा कोई लेना-देना नहीं है. बताते चलें कि बेशक नीतीश कुमार पीके पर कुछ कहने से बच रहे हैं, लेकिन राजनीतिक जानकार इसको भी गंभीरता से ले रहे हैं. पीके और नीतीश कुमार का संबंध भी बड़ा पुराना है. जब पीके ने साल 2014 में पीएम मोदी का चुनावी कैंपेन करने के बाद नाता तोड़ा था तो नीतीश कुमार ने ही पीके को अपने साथ जोड़ा था. साल 2015 में आरजेडी-कांग्रेस और जेडीयू गठबंधन की जीत के बाद पीके को जेडीयू का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया था.

दूसरे दलों के लोग पीके को लेकर क्या बोल रहे हैं

एलजेपी (रामविलास) के सुप्रीमो और जमुई लोकसभा सांसद चिराग पासवान ने भी प्रशांत किशोर को लेकर बड़ा बयान दिया है. पासवान ने कहा है कि अच्छे लोगों को राजनीति में जरूर आना चाहिए. अच्छे लोगों के आने के बाद से ही राज्‍य और देश का विकास होगा. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अभी लोजपा रामविलास का किसी भी पार्टी से गठबंधन नहीं है.

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पीके बिहार में हमेशा से ही बीजेपी विरोध में ही चुनावी रणनीति बनाते रहे हैं.

बीजेपी का क्या कहना है

वहीं, बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम और वर्तमान में राज्यसभा सांसद सुशील कुमार मोदी ने भी पीके को लेकर बयान दिया है. मोदी ने कहा है कि फिलहाल बिहार में मुख्यधारा के चार दलों बीजेपी, कांग्रेस, आरजेडी और जेडीयू छोड़ कर किसी भी नए दल के लिए कोई जगह नहीं है.’

क्यों पीके बिहार के लिए हॉटकेक बन गए हैं?

बता दें पीके बिहार में हमेशा से ही बीजेपी विरोध में ही चुनावी रणनीति बनाते रहे हैं. साल बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में इनको सफलता जरूर मिली थी, लेकिन इस सफलता का सारा क्रेडिट नीतीश औऱ लालू यादव ले गए. जानकार मानते हैं कि अब राज्य में बिजली, पानी, सड़क, रोजगार और किसान को मुद्दा बनाकर मतदाताओं को टारगेट नहीं किया जा सकता है. इसलिए देश में आजकल नए सिरे की राजनीति होनी शुरू हो गई है, जिसमें हिंदू, राष्ट्रवाद, अजान और हनुमान चालीसा भी शामिल हैं. प्रशांत किशोर बिहार में पलायन को एक बड़ा हथियार बनाने जा रहे हैं.

प्रशांत किशोर का रोड मैप क्या है? अभी तक इसका खुलासा नहीं किया है. (फाइल फोटो)

पीके को लेकर क्या कहते हैं जानकार

बेशक प्रशांत किशोर बिहार से नए राजनीतिक दल की शुरूआत की बात करें, लेकिन प्रशांत किशोर का रोड मैप क्या है? अभी तक उन्होंने इसका खुलासा नहीं किया है. वरिष्ठ पत्रकार संजीव पांडेय कहते हैं, ‘प्रशांत किशोर बिहार के लिए नए नहीं हैं. वो बिहार की राजनीति में हस्तक्षेप पिछले कुछ सालों से कर रहे हैं. वे राजनीतिक दलों के प्रबंधन के माध्यम से बिहार की राजनीति में सक्रिय रहे. लेकिन, सिर्फ प्रबंधन के आधार पर बिहार बदलने की बात कोरा गप्प है. मेरा प्रशांत किशोर से एक ही सवाल है कि आखिर बिहार में जाति की राजनीति को वो कैसे खत्म करेंगे?

जातिगत राजनीति से कैसे पार पाएंगे प्रशांत किशोर

पांडेय आगे कहते हैं, बिहारी सोच को प्रशांत किशोर कैसे बदलेंगे? बिहार में जाति एक सच्चाई है. यह सच्चाई सिर्फ राजनीतिक दलों के स्तर पर ही नहीं सीमित है. आम जनता भी इसी सोच को बढ़ाती रही है. बिहार में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार तो चुनावी मुद्दा कभी जनता के बीच बना ही नहीं. जातीए गुणा-गणित इतना ज्यादा बिहार में हावी है कि लालू यादव की पार्टी को अब लग रहा है कि सत्ता में भूमिहारों के सहयोग से आया जा सकता है कि उनके पुत्र तेजेस्वी यादव परशुराम जयंती पर जाकर भाषण दे रहे हैं. ऐसे में प्रशांत किशोर बिहार में जातीए विभाजन को शायद ही तोड़ पाएं. फिर किशोर के पास विकास से संबंधित कोई एजेंडा नहीं है. वे नारे जरूर गढ़ सकते हैं.’

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प्रशांत किशोर चुनावी रणनीति बनाकर राजनीतिक दलों को जिताने के लिए विपरित विचारधारा की दलों के साथ काम किया.(फाइल फोटो)

मोदी विरोध पर राजनीति का अंजाम क्या होगा?

वरिष्ठ पत्रकार सुनील पांडेय कहते हैं, लोगों को जहां तक पता है कि वे चुनावी रणनीति बनाते हैं और उसके एवज में पैसे लेते हैं. चुनावी रणनीति बनाकर राजनीतिक दलों को जिताने के लिए उन्होंने विपरित विचारधारा की दलों के साथ काम किया. बीजेपी के साथ सबसे पहले साल 2014 में काम किया. वे भाजपा से पहले नरेंद्र मोदी के साथ जुड़ गए थे. उसके बाद एकाएक उन्होंने भाजपा का साथ छोड़ा और बिहार में भाजपा विरोधी गठबंधन के लिए 2015 में चुनावी रणनीति बनाई. लालू यादव की राजनीति भाजपा के विरोध में रही. लालू यादव भी भाजपा की विचारधारा के विरोध में रहे हैं, लेकिन प्रशांत किशोर के लिए बीच में विचारधारा कहीं आड़े नहीं आए. वे एक हिंदूवादी दल को छोड़ तुरंत एक जाति की राजनीति करने वाले एक धर्मनिरपेक्ष दल के साथ हो गए. इसके बाद वे पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के साथ भी गए, जिसका भाजपा से भारी वैचारिक विरोध है. उन्होंने आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी और तामिलनाडू के द्रमुक ग्रुप के साथ भी काम किया. वे आम आदमी पार्टी के लिए भी अपनी रणनीति बनाते रहे हैं.

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कुलमिलाकर पीके पटना में लगातार डेरा डाल कर युवाओं और पूर्व नौकरशाहों से राय-मशविरा कर रहे हैं. हालांकि, पीके के आने के बाद बिहार में एक नया जातिगत समीकरण बनेगा, इसकी संभावना बहुत कम ही नजर आ रही है. ऐसे में प्रशांत किशोर की राहों में पार्टी बनाने के बाद भी बड़े-बड़े कांटे रहेंगे, जिसे हटा देने के बाद पीके बिहार को जातिगत राजनीति के भंवरजाल से मुक्त कर पाएंगे

Tags: Bihar BJP, Bihar politics, JDU nitish kumar, PM Modi, Prashant Kishor, Prashant Kishore

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