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Thursday, April 30, 2026

काको की धरती के दो सितारे, जो आज़ादी और अदब के आसमान पर हमेशा चमकते रहेंगे, सैय्यद आसिफ इमाम

जगदूत न्यूज अनिल कुमार गुप्ता ब्यूरो प्रमुख जहानाबाद  आज़ादी के 78 साल बाद भी हमारे इतिहास की किताबों में बहुत-से नाम ऐसे हैं जो सुनहरी रोशनी के हक़दार थे, मगर वक्त की गर्द में दब गए। जब भी हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा करते हैं, हमारे ज़ेहन में दिल्ली, कोलकाता, मुंबई जैसे बड़े शहरों की कहानियां गूंजती हैं। मगर बिहार की मिट्टी, खासकर जहानाबाद का काको कस्बा, भी ऐसे वीर सपूतों की जन्मभूमि रहा है जिन्होंने अपने ख़ून, अपनी क़लम और अपनी जांनिसारी से आज़ादी का परचम ऊंचा किया। अहमद दाऊद शम्सी, काको का पहला आई.सी.एस. और नेताजी का हम प्याला,काको की पहचान सिर्फ़ उसकी हरियाली और तहज़ीब से नहीं, बल्कि उन किरदारों से है जिन्होंने इसे इतिहास में अमर कर दिया। सैयद अहमद दाऊद शम्सी, प्रतिष्ठित ज़मींदार सैयद अब्दुल अज़ीज़ शम्सी के सुपुत्र, बिहार के पहले भारतीय आई.सी.एस. अधिकारी थे। वे सिर्फ़ एक अफ़सर नहीं, बल्कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के करीबी दोस्त थे। उनकी दोस्ती सिर्फ़ चाय के प्यालों तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह एक-दूसरे के सपनों और संघर्षों की साझी यात्रा थी। आई.सी.एस. की कठिन परीक्षा पास करके उन्होंने 1921 में भारत लौटकर देश की सेवा का रास्ता चुना। वायसराय के निजी सचिव के रूप में उन्होंने लॉर्ड लिनलिथगो और लॉर्ड वेवेल के साथ काम किया, मगर उनके दिल में सबसे पहले भारत था। मगर किस्मत ने लंबी मोहलत नहीं दी। 1945 में, महज़ 44 साल की उम्र में वे इस दुनिया से रुख़सत हो गए। कहते हैं, जिस महल में शिमला सम्मेलन हुआ, वह उनकी ही संपत्ति थी, जिसे आज़ादी के बाद सरकार ने अपने कब्ज़े में ले लिया।
लतीफ़ शम्सी अदब और राजनीति का संगम
अहमद दाऊद शम्सी के सुपुत्र सैयद लतीफ़ शम्सी, जिन्हें मोहब्बत से “अल्मा चचा” कहा जाता था, सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि काको की आत्मा थे। वे स्वतंत्रता सेनानी, बेबाक राजनेता, अदब के रखवाले और उर्दू शायरी के माहिर थे। राम मनोहर लोहिया के शिष्य के रूप में वे सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े रहे और जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में सक्रिय रहे। इंदिरा गांधी से लेकर जॉर्ज फर्नांडीज़ तक, देश के बड़े-बड़े नेता उनके दोस्त थे, मगर उन्होंने कभी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया। उनका जन्म वायसराय-आवास (आज का राष्ट्रपति भवन) में हुआ था, और ज़िंदगी की आख़िरी सांस उन्होंने अपने पुश्तैनी वतन काको में, 8 जनवरी 2025 को ली। राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित देशभर की हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनकी मौत के बाद न सिर्फ़ भारत, बल्कि पाकिस्तान, गल्फ़, यूरोप और अमेरिका से भी शोक संदेश आए। बिहार के माननीय राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खां ने काको में स्वर्गीय लतीफ शम्सी साहब के परिवार से मुलाकात कर उन्हें सांत्वना दी। उन्होंने कहा, “शम्सी साहब ने अपने साहित्यिक और सामाजिक कार्यों के माध्यम से राष्ट्रहित में महत्वपूर्ण योगदान दिया। स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया। वे जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़े और देश सेवा को अपने जीवन का आधार बनाया। राज्यपाल ने शम्सी साहब की कब्र पर फातिहा पढ़कर उनकी आत्मा की शांति के लिए दुआ की। सैयद लतीफ शम्शी साहब ने उर्दू अदब को नई ऊंचाइयां दीं। साहित्य में योगदान वे उर्दू अदब के एक चमकते सितारे थे। उनकी रचनाएं जैसे “काको की कहानी, अल्मा की जुबानी,” और “अलीगढ़ यूनिवर्सिटी और मेरी दास्तान-ए-हयात” साहित्यिक धरोहर हैं। शम्सी साहब ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया से शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने अपने जीवन को सामाजिक न्याय, शिक्षा और सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने में समर्पित किया। जहानाबाद जिला प्रशासन के उर्दू प्रकोष्ठ ने उन्हें उनकी उपलब्धियों के लिए ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ से सम्मानित किया। उनका जीवन सेवा, संघर्ष और उत्कृष्टता का प्रतीक था। उनकी विरासत साहित्य, शिक्षा, और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।  उनकी सेवाओं को कभी भुलाया नहीं जा सकता। विरासत जो ज़िंदा रहेगी अहमद दाऊद शम्सी की संघर्ष और कामयाबी की कहानी और लतीफ़ शम्सी का साहित्य और समाजसेवा  ये दोनों मिलकर काको को वह पहचान देते हैं, जो किसी ताज से कम नहीं। उनके किस्से, उनकी किताबें, उनकी शायरी और उनका जज़्बा आने वाली पीढ़ियों के लिए मशाल की तरह हैं। काको की मिट्टी ने यह सिखाया है कि चाहे वक्त कितना भी बेरहम क्यों न हो, हक़ की आवाज़ और मोहब्बत की खुशबू कभी मिटती नहीं। आज जब हम आज़ादी का जश्न मना रहे हैं, तो इन गुमनाम मगर रौशन चेहरों को याद करना हमारी जिम्मेदारी है। क्योंकि इतिहास सिर्फ़ उन लोगों का नहीं होता जो किताबों में दर्ज हैं, बल्कि उन लोगों का भी होता है जिन्होंने चुपचाप अपना सब कुछ इस मुल्क पर कुर्बान कर दिया। अल्लाह से दुआ है कि अहमद दाऊद शम्सी और लतीफ़ शम्सी को जन्नतुल फिरदौस में जगह अता करे। उनकी विरासत, उनकी मोहब्बत और उनका जज़्बा हमेशा ज़िंदा रहेगा।

Prabhu Jee
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ब्यूरो चीफ, खगड़िया (जगदूत न्यूज)
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