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Monday, May 4, 2026

बदला’ नहीं ‘बदलाव’

जगदूत न्यूज अनिल कुमार गुप्ता ब्यूरो प्रमुख जहानाबाद

“पढ़ लिखकर मूर्खों की बात करते हैं, बदलाव क्यूं नहीं आख़िर क्यूं हम बदला पर चाव करते है। एक दफा सोच लो ज़रूरी क्या है, बदलाव या बदला की पुनः पुनः पुनरावृति कश ऐसा हो पता जैसा हम चाहते हैं, हो तो ये रहा है,जैसा हम नहीं चाहते हैं। समाज के ठेकेदारों ने तो समाज की सभ्यता ही बदलकर रख दिया है।मैं इस निबंध में व्यक्ति की बात तो अवश्य करूंगी पर व्यक्ति विशेष की नहीं, जाति, धर्म की बात तो अवश्य करूंगी पर किसी विशेष जाति, धर्म की नहीं और ना ही तो मैं किसी काल विशेष की बात करूंगी। अब आप सोच रहे होंगे कि आख़िर मैं कहना क्या चाहती हूं तो आप चिंता ना करें निम्नलिखित पंक्तियों को पढ़कर सब स्पष्ट हो जाएगा।मुझे कहते हुए तकलीफ़ हो रही है कि ये राम और रहीम की धरती है, मुझे यह भी कहते हुए अत्यंत पीड़ा हो रही है की ये बुद्ध,और महावीर की धरती है और यह भी कहते हुए शर्म आ रही है ये धरती महाराणा प्रताप और लक्ष्मीबाई की है। महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस,भीमराव अंबेडकर, रानी लक्ष्मीबाई और भगत सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने तो कल्पना भी नहीं किया होगा कि उनके सपनों का भारत ऐसा होगा। अब ये धरती उनके सपनों का तो कदापि नहीं रही, बल्कि चोर, लुटेरों और मक्कारों की धरती अवश्य बन गई है, अब ये धरती झूठे, मवालियों की धरती बन गई है। बड़े गर्व से कहा करते थे हम भारतवासी हैं, लेकिन अब अंदर से आवाज़ आती है हम बदलापुर के बदलावासी हैं।बदला, बदला और सिर्फ बदला! आख़िर कब तक चलेगा तुम्हारा बदला, कही सोचा है? ये बदले की आग कहीं सभी को जलाकर राख न कर दे, सब कुछ मिटा ना दे, क्यूंकि बदला इतना आसान नहीं होता। ये दूसरे को जलाने से पूर्व स्वयं को ही क्रोध की अग्नि में जलाकर राख कर देता है।दुःख तब नहीं होता जब एक निपढ़, गंवार बदले की बात बोले या ऐसी मंशा रखे। दर्द तब हद से गुजर जाता है जब शिक्षा जगत के सर्वोच्च पद पर विराजमान व्यक्ति भी बदले के भाव लिए ओछी बातें करते दिखते हैं।किसी ने सच कहा है कि समाज को खतरा मूर्ख लोगों से नहीं बल्कि समाज में तमाशबीन बुद्धिजीवियों से है। समाज में रह रहे बुद्धिजीवी वर्ग से मेरी ख़ास शिकायत है। आज के समय में ये अपने दायित्व,अपने कर्तव्य भूल बैठे हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि अब इन्हें अपना कर्तव्यबोध कौन कराए? जब रक्षक ही भक्षक बन बैठे तो इंसान किससे उम्मीद लगाए? आज के बुद्धिजीवी वर्ग अपना दायित्व,अपने कर्तव्य भूल बैठे हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि अब इन्हें अपने कर्तव्य का बोध कौन कराए? जब रक्षक ही भक्षक बन बैठे तो इंसान किससे उम्मीद लगाए समाज में रह रहे आम जन मानस ने न तो कल किसी का अहित किया ना आज के आम लोग ही ऐसा करते हैं। कल भी संपन्नता ने विपन्नता का दोहन किया और आज़ भी यही हो रहा है। अगर अपनी दृष्टि दौड़ाएं तो आप भली भांति पायेंगे कि ये दुष्प्रवृति निरंतर बढ़ती जा रही है। अगर समाज में यही धारणा बनी रही तो वो दिन दूर नहीं कि जो कभी बुद्ध और गांधी की धरती थी वहां रूस- यूक्रेन युद्ध की गृहयुद्ध जैसी स्थिति बन जाए। अब निर्णय लेना और इस बात पर विचार करना समाज के बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों पर है कि वो इस देश को कैसी दिशा देना चाहते हैं? वो देशवासियों को भारतवासी रहने देना चाहते हैं या बदलापुरवासी बनाना चाहते हैं। समाज को बदला की आवश्यकता है या बदलाव की, इस बात पर पुनः विचार करने की ज़रूरत है।

” हां! पढ़ लिखकर हम ओछी बात करते हैं,
ना जी ना! हम पढ़े लिखे लोग हैं,
हम बदला नहीं बदलाव चाहते हैं।”

Prabhu Jee
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ब्यूरो चीफ, खगड़िया (जगदूत न्यूज)
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