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Monday, April 20, 2026

करबला में हक और बातिल की लड़ाई होई थी ,जिस में हक जीत होई और बातिल की शिकस्त जोगिया शरीफ में मोहर्रम का जुलूस बहुत ही धूम धाम से निकाला गया

जगदूत न्यूज खगड़िया बिहार अलौली से अमित कुमार कि रिपोर्ट खगड़िया अलौली प्रखंड के मरकजी खानकाह फरीदिया जोगिया शरीफ* में इस वर्ष मोहर्रम का जुलूस बहुत ही धूम धाम से निकाला गया।जुलूस *मरकजी खानकाह शरीफ* से निकल कर हरिपुर के मैदान में समस्तीपुर जिला के उजान गांव से और हरिपुर बाजार के ताजिया से मिलान किया गया ये जुलूस सदियों से होता आ  रहा है ।*मरकजी खानकाह फरीदिया जोगिया शरीफ के सज्जादा नशीन बाबू मौलाना सईदेन फरीदी* ने बताया पैगंबर-ए-इस्‍लाम हजरत मुहम्‍मद के नाती हजरत इमाम हुसैन को इसी मुहर्रम के महीने में कर्बला की जंग में परिवार और दोस्तों के साथ शहीद कर दिया गया था।अंग्रेजी कैलेंडर को देखें तो इस बार मुहर्रम का इस्‍लामिक महीना 20 जुलाई से शुरू हुआ है। मुहर्रम का दसवां दिन आशूरा होता है और इस दिन मुहर्रम मनाया जाता है। बता दें, इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार साल का पहला महीना मुहर्रम होता है। इस दिन को ‘आशूरा’ कहते हैं। यह महीना मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस बार 29 जुलाई मुहर्रम मनाया गया।बता दें, इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार पैगंबर-ए-इस्‍लाम हजरत मुहम्‍मद साहब के नाती हजरत इमाम हुसैन को इसी मुहर्रम के महीने में कर्बला की जंग में परिवार और दोस्तों के साथ शहीद कर दिया गया था। जिसके बाद से इसे गम का महीना भी माना जाता है।*क्यों मनाया जाता है मुहर्रम* ?इमाम हुसैन और उनके फॉलोअर्स की शहादत की याद में दुनियाभर में शिया मुस्लिम मुहर्रम मनाते हैं। इमाम हुसैन, पैगंबर मोहम्मद के नाती थे, जो कर्बला की जंग में शहीद माने हुए थे। मुहर्रम क्यों मनाया जाता है, इसके लिए हमें तारीख के उस हिस्से में जाना होगा, जब इस्लाम में खिलाफत यानी खलीफा का राज था। ये खलीफा पूरी दुनिया के मुसलमानों का प्रमुख नेता होता था। पैगंबर साहब की वफात के बाद चार खलीफा चुने गए थे। लोग आपस में तय करके इसका चुनाव करते थे।*जब आया घोर अत्याचार का दौर*इसके लगभग 50 साल बाद इस्लामी दुनिया में घोर अत्याचार का दौर आया, मक्का से दूर सीरिया के गर्वनर यजीद ने खुद को खलीफा घोषित कर दिया, उसके काम करने का तरीका बादशाहों जैसा था, जो उस समय इस्लाम के बिल्कुल खिलाफ था, तब इमाम हुसैन ने यजीद को खलीफा मानने से इनकार कर दिया। इससे नाराज यजीद ने अपने राज्यपाल वलीद पुत्र अतुवा को फरमान लिखा, ‘तुम हुसैन को बुलाकर मेरे आदेश का पालन करने को कहो, अगर वो नहीं माने तो उसका सिर काटकर मेरे पास भेजा जाए।’राज्यपाल ने हुसैन को राजभवन बुलाया और उनको यजीद का फरमान सुनाया। इस पर हुसैन ने कहा- ‘मैं एक व्याभिचारी, भ्रष्टाचारी और खुदा रसूल को न मानने वाले यजीद का आदेश नहीं मान सकता।’ इसके बाद इमाम हुसैन मक्का शरीफ पहुंचे, ताकि हज पूरा कर सकें। वहां यजीद ने अपने सैनिकों को यात्री बनाकर हुसैन का कत्ल करने के लिए भेजा। इस बात का पता हुसैन को चल गया और लेकिन मक्का ऐसा पवित्र स्थान है, जहां किसी की भी हत्या हराम है।इसलिए उन्होंने खून-खराबे से बचने के लिए हुसैन ने हज के बजाय उसकी छोटी प्रथा उमरा करके परिवार सहित इराक चले आ गए। मुहर्रम महीने की दो तरीख 61 हिजरी को हुसैन अपने परिवार के साथ कर्बला में थे, नौ तारीख तक यजीद की सेना को सही रास्ते पर लाने के लिए समझाइश देते रहे, लेकिन वो नहीं माने। इसके बाद हुसैन ने कहा- ‘तुम मुझे एक रात की मोहलत दो..ताकि मैं अल्लाह की इबादत कर सकूं’ इस रात को आशूरा की रात’ कहा जाता हैक्या है इतिहास ‘इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक पैगंबर-ए-इस्‍लाम हजरत मुहम्‍मद साहब के नाती हजरत इमाम हुसैन की इसी मुहर्रम के महीने में कर्बला की जंग10 मोहर्रम 61 हि., 10 अक्टूबर 680 ईस्वी स्थान कर्बला परिणाम उमय्यद सेना विजय हजरत इमाम हुसैन इब्न अली और उनके परिवार और साथियों को शहीद कर दिया था।कर्बला की ये जंग हजरत इमाम हुसैन और बादशाह यजीद की सेना के बीच हुई थी। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार मुहर्रम के महीने में दसवें दिन ही इस्‍लाम की रक्षा के लिए हजरत इमाम हुसैन ने अपनी जान कुर्बान कर दी थी। इसे ‘आशूरा’ भी कहा जाता है इसीलिए मुहर्रम के दसवें दिन को बहुत खास माना जाता है।*मौलाना बाबू सिबतैन फरीदी* ने बताया के हजरत इमाम हुसैन का मकबरा इराक के शहर कर्बला में उसी जगह है, जहां इमाम हुसैन और यजीद की जंग हुई थी। ये जगह इराक की राजधानी बगदाद से अनुमानित 120 किलोमीटर दूर है। इसे मुस्लिमों के सबसे सम्मानित स्थानों में से एक माना जाता है। मुहर्रम में मुसलमान हजरत हुसैन की इसी शहादत को याद करते हैं,आगे उन्होंने बताया कि कर्बला वालों का गम यूं तो सारी दुनिया में मनाया जाता है लेकिन अपने अंदाज और कैफियत के लिहाज से हिंदोस्तान का मुहर्रम बहुत खास है. यहां मुहर्रम किसी खास मजहब, तबके या बिरादरी तक सीमित नहीं ये हमारी सांझी तहजीब का अटूट हिस्सा है. वाक्या भले ही अरब का हो लेकिन इसकी याद में हिंदोस्तान का दिल धड़कता हुआ दिखता है, हुसैन के मातम में तमाम हद बंदियां टूट जाती हैं. *हिंदू, मुसलमान, सिख और इसाई,* सब शहीदे इंसानियत को अपने अपने अंदाज में याद करते हैं. कशमीर से कन्याकुमारी तक इसके सिलसिले फैले हुए हैं. इलाके के साथ बोलियां और अंदाज बदलते जाते हैं लेकिन शिद्दत एक जैसी,*हिंदोस्तान में मुहर्रम भाईचारे की मिसाल है.* धर्म और वर्ग की हदबंदियां यहां टूट जाती हैं. नफरत के सौदागरों ने सांझी तहजीब पर बार बार चोट की है लेकिन मुहर्रम पर इसका कोई भी असर नहीं पड़ा. आज भी गैर मुस्लिम पूरी आस्था से मुहर्रम में शामिल होते हैं.*जंग में हुसैन के 72 फॉलोअर्स मारे गए।*तब सिर्फ हुसैन अकेले रह गए थे, लेकिन तभी अचानक खेमे में शोर सुना, उनका छह महीने का बेटा अली असगर प्यास से बेहाल था। हुसैन उसे हाथों में उठाकर मैदान-ए-कर्बला में ले आए। उन्होंने यजीद की फौज से बेटे को पानी पिलाने के लिए कहा, लेकिन फौज नहीं मानी और बेटे ने हुसैन की हाथों में तड़प कर दम तोड़ दिया। इसके बाद भूखे-प्यासे *हजरत इमाम हुसैन* का भी कत्ल कर दिया। हुसैन ने इस्लाम और मानवता के लिए अपनी जान कुर्बान की थी।पुलिस महानिदेशक कार्यालय से मुहर्रम की सुरक्षा-व्यवस्था को लेकर अलौली थाना से पुख्ता इंतजाम किया गया था। बाबू सिबतैन फरीदी बाबू अल्हाज सकलैन फरीदी बाबू सालिक फरीदी बाबू हरमैन फरीदी बाबू नवाज फरीदी बाबू जुन्नराइन फरीदी बाबू नूरूल ऐन फरीदी फैजान अहमद ,बाबू तौफिक फरीदी,बाबू, बाबू नवाज फरीदी, अमन फरीदी, बाबू बहरैन फरीदी,बाबू फेदाए रसुल फरीदी,,नौशाद मुखिया, सिराज सरपंच, नवैद आलम,इसरारुल हक उप प्रमुख, साकिर फरीदी, अरबाज आलम,तौफीक फरीदी, गुलफराज आलम, मोहम्मद अरबाज,मोहम्मद नाजिम फरीदी,तंजीम फरीदी,सहांशा उस्ताद, समर अली, साजिद आलम, नेहाल अहमद,सहूलत, अजहर मिस्त्री,चांद फुटवियर, मोहम्मद गुलजार अजीमी,अमजद हरिपुर, खल्लक अहमद ,इमदाद मुखिया प्रतिनिधि ,साहिर मेंबर,साकिर मिस्त्री,चांद आलम, उमर अली, प्यारे अहमद,साजिम आलम , अहमद अली, राकेश कुमार अरूण कुमार, राजेश कुमार सोनू कुमार, अमन कुमार, मौजूद थे

Prabhu Jee
Prabhu Jeehttp://www.jagdoot.in
ब्यूरो चीफ, खगड़िया (जगदूत न्यूज)
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