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Tuesday, May 5, 2026

ध्रुवीकरण की बदली धारा, नये सितारे का उदय और वेंटिलेटर पर वामपंथ:चंदन चौरसिया 

*लध्रुवीकरण से विकास तक: 5 राज्यों के नतीजों ने बदली राजनीति की दिशा*

*ममता आउट, वाम खत्म, विजय इन—5 राज्यों ने लिखा नया सियासी इतिहास*

*घुसपैठ, तुष्टीकरण और गुस्सा—बंगाल में सत्ता परिवर्तन की पूरी कहानी*

JNA/कौशल कुमार पटना। वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा कि बगाल में अंततः खेला हो ही गया. अभूतपूर्व परिणाम ध्रुवीकरण के खेल में हिंदू वोटरों का पलड़ा भारी. एसआइआर का प्रभाव. तृणमूल के अतिवाद, उग्र कार्यशैली और तुष्टीकरण की पराकाष्ठा की हार. डेमोग्राफिक बदलाव के दुष्परिणामों पर बंगाल के लोगों की प्रचंड प्रतिक्रिया. नतीजा-पहली बार बांग्ला में भी अपनी कहानी लिखेगी भाजपा।

 

पांच राज्यों के परिणाम के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं- 1) बंगाल में हुआ ऐतिहासिक बदलाव, 2) केरल में हार के साथ ही वामपंथी राजनीति का वेंटिलेटर पर पहुंचना, 3) तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति के लिए टीवीके के रूप में नयी चुनौती. इसके अलावा असम में भाजपा की लगातार तीसरी और पुडुचेरी में दूसरी जीत देश के मौजूदा मूड को दर्शाती हैं। सबसे बड़ी सीख, जो सभी दलों को लेनी चाहिए, वह यह है कि हमेशा अल्पसंख्यकों को ढाल बनाकर चुनावी पटकथा नहीं लिखी जा सकती. सकारात्मक राष्ट्रवाद, विकास और समावेशी नेतृत्व ही जीत का आधार होने चाहिए, सकारात्मक राष्ट्रवाद से तात्पर्य यह है कि देश को भाषा, क्षेत्रीयता और उत्पत्ति (जाति, वर्णं) के आधार पर भेदभाव और ऐसे हर पाखंड से बाहर आना होगा. यह सीख भाजपा के लिए भी उतनी ही जरूरी है, जितनी अन्य दलों के लिए, हार तो सिखाती है, लेकिन बार किन कई बार जीत से भी सीख लेनी चाहिए। लगातार संगठनात्मक सक्रियता के बीच उपलब्धता ही आपको स्वीकार्यता दिलायेगी और विजयश्री भी. स्पष्टता के बावजूद पांच राज्यों के विधानसभा परिणामों ने कई प्रमुख प्रश्नों को जन्म दिया है, जिनका उत्तर जरूरी है, पढ़िए यह विश्लेषण, कुछ अलग शैली में तृणमूल कांग्रेस की हार के प्रमुख कारण ममता बनर्जी के नेतृत्व में 15 साल पहले एक शुरुआत हुई थी. राज्य ने इसे वामदलों के अत्याचार से मुक्ति के रूप में देखा, लेकिन, धीरे-धीरे वामदलों के कार्यकर्ता तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का काडर बन गये और उनकी कार्यशैली पार्टी का मूल. चुनावी लाभ के लिए बांग्लादेशी घुसपैठ पर कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया. अतिवाद की नींव पड़ी. विरोध और विरोधी के दमन की नीति अपनायी गयी., राजनीतिक हत्याएं आम के साथ दुष्कर्म जैसी घटनाओं ने सामाजिक आक्रोश का रूप ले दिया. घुसपैठियों के बढ़ते अतिक्रमण से आम बंगालियों का जीना दूभर था. ऐसे में सुरक्षाबलों की भारी तैनाती ने उन्हें बिना डरे वोट डालने का हौसला दिया. स्थानीय स्तर पर कट-मनी और सिंडिकेट सिस्टम के तहत वसूली ने उद्यमियों समेत पूरे समाज को भयाक्रांत कर रखा था. आंदोलन की जन्मभूमि रहे बंगाल को यह कैसे स्वीकार होता, इसलिए यह परिणाम। एसआइआर के जरिये घुसपैठिया भगाओ और हिंदुत्व फैक्टर कितने प्रभावी बिहार के नेपाल और बंगाल से सटे इलाकों, बंगाल और पूरे उत्तर पूर्व में किस तरह घुसपैठिये बढ़े हैं, यह खुली आंखों से देखा जा सकता है. वोटर लिस्ट के स्पैशल इन्टेंसिव रिवीजन (एसआइआर) की चुनाव आयोग की नीति के चलते बंगाल में करीब 27 लाख वोटर्स वोटिंग प्रकिया में छंट गये और वोट नहीं डाल सके. सही हुआ या गलत, यह बहस का मुद्दा हो सकता है, लेकिन इनमें बड़ी संख्या में बंगलादेशी घुसपैठियों के होने का अनुमान है. इसका सीधा प्रभाव ममता का गढ़ मानी जाने वाली छह अल्पसंख्यक बहुल जिलों की 118 सीटों के नतीजों से नजर आता है. जहां पिछले चुनाव में इनमें 103 सीटें टीएमसी ने जीती थीं, वहीं इस बार यह घटकर 58 रह गयीं. जबकि भाजपा जिसे पिछली बार इन जिलों में सिर्फ 14 सीटों पर जीत मिली थी, इस बार 53 सीटें उसके खाते में आयी. ममता के दूसरे गढ़ यानी दक्षिण चौबीस परगना में पिछली बार भाजपा को एक भी अलावा भाजपा संगठन की जमीनी रणनीति और मोदी शाह की ताबड़तोड़ रैलियों ने वोटरों को बिना डरे वोट डालने का साहस दिया. यहां यह भी रोचक है कि एसटी की 100 प्रतिशत और एससी की 91 प्रतिशत सीटों पर भाजपा की जीत ने हिंदुत्व के वर्गीकरण की सीमाएं भी धूमिल कर दीं. जीत यह भी बताती है कि पांच लाख नये जेन-जी वोटरों ने भी पार्टी का साथ दिया।भाजपा के लिये जीत के मायने 1977 से वाम दलों ने लगातार 34 वर्ष, फिर तृणमूल कांग्रेस ने पूरे 15 साल तक बंगाल में आधुनिक विकास की राजनीति को पनपने नहीं दिया. लेकिन, लगातार तीन टर्म की एंटी इन्कमबेसी और टीएमसी के सक्रियता ने अंततः वोटों में बदल दिया. बिहार के बाद बंगाल जीतते ही 2029 के लोकसभा चुनावों की राह भी पार्टी के लिए आसान हो सकती है. बंगाल को जोड़ लें तो 22 राज्यों में भाजपा की सरकार होगी. इनमें कुल 396 लोकसभा सीटें हैं, जिनमें अकेले यूपी में 80, बिहार में 40 और पश्चिम बंगाल की 42 सीटें हैं. महाराष्ट्र की 48, मध्यप्रदेश की 29 और गुजरात की 26 सीटें भी जोड़ लें तो समीकरण पार्टी के पक्ष में नजर आते हैं. राज्यसभा में मजबूती तो तय है। जीत से पश्चिम बंगाल को क्या उम्मीद है 1960 के पहले बंगाल देश का औद्योगिक केंद्र था. देश के जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से अधिक थी. लेकिन, 1977 के बाद वाम दलों और टीएमसी के 49 साल के शासन में इस ढांचे में तेजी से गिरावट आयी. 2024 तक जीडीपी में हिस्सेदारी घटकर 5.6 प्रतिशत रह गयी. टाटा ने सिंगूर क्या छोड़ा, व्यावसायिक घरानों ने मानो राज्य से मुंह मोड़ लिया. 2019 से 2024 के बीच ही करीब 2200 एमएसएमई यहां बंद हुई, हालिया स्थिति यह है कि राज्य में सरकारी कर्मियों के वेतन के लाले पड़े हुए हैं. भाजपा सरकार बनने के बाद केंद्र का भरपूर सहयोग तय है, इसलिए अब विकास कार्यों में रुकावट नहीं आयेगी. केंद्र की तमाम फ्लैगशिप योजनाएं, जिन्हें ममता के शासन ने अवरुद्ध कर रखा था, अब निर्बाध रूप से चलेंगी. पार्टी को वोट मिलेंगे और प्रदेश को विकास। केरल में हार क्या वामपंथ का अंत है इसे वामपंथ का अंत भले ही न समझा जाए, लेकिन यह संसदीय राजनीति में फिलहाल मृत्युशैया पर पहुंच गया है. देश में अपने खाते के इकलौते राज्य को गंवाते ही 50 साल में पहली बार लेफ्ट मेनस्ट्रीम पॉलिटिक्स से बाहर हो गया है. हालांकि, केरल में अब भी सीपीआई-एम का लंबा-चौड़ा काडर व वोट बैंक है, इसलिए भविष्य में यहां इनकी वापसी वास्तविकता से परे नहीं कही जा सकती. इसके लिए इन्हें भी अब विकास के मॉडल को अपनाना पड़ेगा. दूसरी ओर, देखना यह है कि कांग्रेस नीत यूडीएफ क्या भाजपा शैली में लंबी पारी खेल पायेगा, फिलहाल तो वह सीएम पद को लेकर भीतरी मतभेद से जल्दी उबर ले, वहीं बड़ी बात है। तमिलनाडु में थलपति विजय की जीत को कैसे करेंगे तृणमूल शासन में जिस तरह राजनीतिक अतिवाद, भ्रष्टाचार और अपराध ने पैर पसारे, स्टालिन के नेतृत्व में तमिलनाडु में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति बनी रही. द्रविड़ राजनीति के नाम पर जनता अब दो दलीय प्रणाली से छले जाने को तैयार नहीं थी. ऐसे में सिने स्टार विजय के रूप में उन्हें सपनों का एक ऐसा नायक नजर आया, जो युवाओं को रोजगार, भ्रष्टाचार के खात्मे और विकास की राह पकड़ने की बात कर रहा था. यहां की राजनीति में व्यक्ति-उपासना हमेशा से मायने रखती रही है. एमजीआर, जयललिता के बाद विजय और उनकी पार्टी टीवीके ने लोगों के दिलों से होते हुए डेब्यू में ही सत्ता के गलियारे तक जगह बना ली।

Prabhu Jee
Prabhu Jeehttp://www.jagdoot.in
ब्यूरो चीफ, खगड़िया (जगदूत न्यूज)
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