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Sunday, May 3, 2026

बिहार बंद ये बस एक हड़ताल नहीं, एक इंक़लाब था, सैयद आसिफ इमाम काकवी

जगदूत न्यूज अनिल कुमार गुप्ता ब्यूरो प्रमुख जहानाबाद किसी ने पूछा बिहार बंद सफल रहा या फेल? हमने मुस्कुराकर कहा “बिहार ने खुद जवाब दे दिया है। पटना की सड़कों पर सन्नाटा नहीं था, बल्कि एक जनसैलाब था। जहानाबाद की मिट्टी गवाही दे रही थी, कि आवाज़ें अब दबेंगी नहीं। भोजपुर की पटरियों पर गुस्सा दौड़ रहा था, और सीमांचल की फिज़ाओं में इंक़लाब गूंज रहा था। यह बंद कोई पार्टी का इश्तिहार नहीं था, यह बंद उस सिसकती हुई चुप्पी का जवाब था मतदाता सूची से नाम काटने की साज़िश पर थोप दी गई थी। यह बंद था उस मज़दूर की आवाज़, जिसका नाम लिस्ट से हटा दिया गया। यह बंद था उस बुज़ुर्ग महिला का हक़, जिससे उसके गली के चौक पर पहचान मांगी गई। यह बंद था उस छात्र का ग़ुस्सा, जिसका नाम अब तक जुड़ा ही नहीं! जब सरकार जनता के सवालों से भागे, और जनता रेल रोके, सड़क रोके, सिस्टम से टकराए तो बंद सिर्फ़ ‘सफल’ नहीं होता, वो ‘ऐतिहासिक’ हो जाता है। बिहार ने बता दिया ये मिट्टी सिर्फ़ लहू की नहीं, हक़ की भी खेती जानती है! जिस धरती ने जेपी आंदोलन दिया, जिस धरती से आज़ादी की मशाल जली, वही बिहार आज फिर जाग गया है। इस बार लड़ाई किसी राजा से नहीं, इस बार लड़ाई है ‘चुप्पी’ के उस सिस्टम से जो नाम काटता है, फिर कहता है “सूचना दी गई थी।” सवाल अब जनता पूछ रही है क्या चुनाव आयोग बताएगा कि मतदाता सूची से नाम हटाने का आधार क्या था? क्या पसमांदा, दलित, ग़रीब और मुसलमान इस देश के बराबर नागरिक नहीं? क्या संविधान सिर्फ अमीरों की जागीर है? जब राहुल गांधी और तेजस्वी यादव पटना की सड़कों पर दिखे, जब किसान और छात्र एक साथ बोल उठे ‘नाम जोड़ो, हक़ दो!’ जब गाँव की माएं, छोटे दुकानदार, मज़दूर और विद्यार्थी नारे लगाएं, तो यह कोई साधारण विरोध नहीं होता यह संविधान की हिफ़ाज़त की हुंकार होती है। बिहार बंद कुर्सियों को नहीं, सोच को हिलाने आया है! कोई पूछे, “क्यों बंद करवा रहे हो?” तो जवाब दो क्योंकि हमारा नाम हमारे वजूद से जुड़ा है।क्योंकि जब नाम काटा जाता है, तो सिर्फ एक वोट नहीं जाता एक नागरिक की पहचान, उसकी उम्मीद, उसका अधिकार छीना जाता है। यह आंदोलन नहीं, एलान है कि अब कोई भी ग़रीब इस देश में गिना जाएगा। कि अब कोई भी नागरिक बेआवाज़ नहीं रहेगा। कि अब कोई भी सरकार वोटर लिस्ट से नाम नहीं हटा पाएगी बिना जनता से टकराए। बिहार बंद लोकतंत्र की दीवार पर वो इबारत है, जिसे मिटाने की कोशिश की गई थी पर अब वो आवाज़ बन चुकी है।

Prabhu Jee
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ब्यूरो चीफ, खगड़िया (जगदूत न्यूज)
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