JNA अरुण कुमार वर्मा
एक अकेला रण में भारी,शर सायक सब हुआ बेकार
काल बना अभिमन्यु खड़ा था,चक्रव्यूह का टूटा द्वार
अगणित कौरव सेना आगे,हुआ विपर्यय रण संभार
महाभट्ट लड़ लड़कर हारे,विफल हो गया शस्त्र प्रहार।
भट योद्धा था बड़ा प्रतापी,अरिहंता कालों का काल
कर्ण द्रोण कृप अश्वत्थामा, से जाता न वीर सम्हाल
लक्ष उडुगण मध्य सूर्य था,ऐसा होता था आभास
सौभद्रेय की रणवाजी से,चमका रण में तीव्र प्रकाश।
धधकी अग्निवाण की ज्वाला,लपकी कौरव दल की ओर
रणभूमि का हर एक कोना,लहक उठा तपकर चहुँ ओर
कौरव सेना बनी पतंगा,रणवैभव का पारावार
अहिगण मध्य खगेश खड़ा था,मारे सायक से टंकार।
महारथी आक्रांत पड़े थे,सबका वैभव हुआ उदास
पुत्रशोक में खिन्न सुयोधन,शुष्क चक्षु ले हुआ हताश
श्रेष्ठ गदाधर समझ चुका था,बहुरूपिया बन उतरा काल
कौन वीर है इस सेना में,जो रण बीच बने अब ढाल।
एकसाथ सब मिलकर मारो,उद्यम करो कराओ त्राण
मिलकर आयुध साथ चलाओ, हरो शीघ्र बालक का प्राण
वरणा आज पराजय होगी,खंडित होगा उठा गुमान
प्रक्षेपण कर दिव्यास्त्रों का,एकसाथ ही कर सन्धान।
सप्तरथी मिलकर घेरा था,कलुषित मन वैरी की राह
सबने मिलकर रार मचाया,पा न सका शौर्य का थाह
वडवानल बन विचर रहा था,तेजपुंज सौभद्र प्रताप
कुरुक्षेत्र शोणित से भीगा,गहे वीर बालक शर चाप।
कौरव सेना हार चुकी थी,भाग पड़ाई रण के पार
सारी अकड़ छोड़ भागी थी,छोड़ हृदय से विजय विचार
तब प्रपंच ने मारी बाजी,लजा गया था समर विधान
मिलकर सप्तरथी कर बैठा,एक साथ आयुध सन्धान।
सूतपुत्र ने जब पीछे से,भोंक दिया था तीक्ष्ण कृपाण
व्यथित मेदिनी काँप उठी थी,अंगराज को कायर मान
अभिमन्यु ने द्रोण से पूछा,हे गुरुवर यह कैसी नीति
सप्तरथी एकल योद्धा से,करे समर यह बड़ी अनीति।
लगा कलंक द्रोण के माथा,उनकी गुरुता को धिक्कार
मज्जन करके क्या धो पाये,चाहे बहे गङ्ग की धार
कटे हाथ धड़ कटा पड़ा था,पर थी आँखें मद में चूर
पड़ा धरा पर था वह योद्धा,चढ़ी त्योरियाँ थी भरपूर।
यह प्रपंच की जीत बड़ी थी,हारा ओज समर में आज
एक निहत्थे की हत्या से,थी लज्जित कुरुवीर समाज
गूंज उठी गौरव की गाथा,जैसे वीर तजा था प्राण
मलिन पड़ा था कुरुवीरों का, सारा सौरभ सारा मान।
क्रमशः
अनिल कुमार झा
जमुआ,अररिया


