डा.के.के.चौधरी’वियोगी’-पूर्णिया
“माँ तेरी गोद मुझे, मेरे अनमोल,
होने का भी एहसास कराती है।।
माँ तेरी ही दी गई हिम्मत मुझको,
जंग-जीतने हेतु आस दिलाती है।।
माँ तेरी सीरत मुझको आदमी से,
एक कामयाब इन्सान बनाती है।।
माँ तेरी डाँट मुझको नित नई राह,
नाप ही लेने को दीप दिखाती है।।
‘माँ’ तेरी सलोनी सूरत ही मुझको,
अपनेपन संग पहचान बताती है।।
माँ तेरी पूजा, मुझसे हुए अकर्म-,
कुकर्म और संताप को मिटाती है।
“माँ” तेरी लोरी को याद करते ही,
मुझे एक बेहतर नींद सुलाती है।।
ममता की नजरों से भले न दूर हूं।
अक्सर तेरी याद मुझे रुलाती है।।


