गुरु’ शब्द का अनुवाद नहीं किया जा *सकता,न तो ‘शिक्षक’ शब्द में और न ही ‘मास्टर’ शब्द- स्वामी उदय चेतन
गुरु का शाब्दिक अर्थ है ‘प्रकाश-ज्ञान,ध्यान,हँसो-हँसाओ से मिलती है शांति- अरुण कुमार वर्मा*
*एक दिवसीय ओशो गुरु पूर्णिमा महोत्सव सम्पन्न*
JNA/ अभिषेक राज
पत्रकार नगर, खगड़िया ।गुरु पूर्णिमा हिंदू-बौद्ध-जैन आध्यात्मिक परंपराओं का एक पवित्र दिन है। यह एक ऐसे अवसर के रूप में चिह्नित है जब शिष्य अपने गुरु (मास्टर) के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करते हैं। हिंदू कैलेंडर के आषाढ़ महीने की पूर्णिमा की रात (जुलाई की शुरुआत या अंत की पूर्णिमा) को हर साल गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। स्थानीय मिल रोड स्थित विज्ञान धर्म आश्रम में ओशो गुरु पुर्णिमा एक दिवसीय महोत्सव का आयोजन किया गया । कार्यक्रम में ज्ञान , ध्यान,योग पर बिस्तार पूर्वक चर्चाओं का दौर घंटों चलता रहा । हँसो इंडिया,हँसों बिहार,हँसों खगड़िया व हँसोड़ आंदोलन के संस्थापक अरुण कुमार वर्मा ने कहा-ओशो कहते हैं,”‘गुरु’ शब्द का अनुवाद नहीं किया जा सकता। न तो ‘शिक्षक’ शब्द में और न ही ‘मास्टर’ शब्द में वह सुंदरता है। गुरु का शाब्दिक अर्थ है ‘प्रकाश’।बाहर से गुरु से मिलना एक महान आशा, एक महान आकांक्षा की शुरुआत है। बोले,गुरु और शिष्य के बीच सबसे बड़ा रहस्य जीया जाता है, सबसे गहरा जीया जाता है, सबसे ऊंचा प्रवाह होता है। वहीं सहरसा से आए यह ज्ञात और अज्ञात के बीच, सीमित और अनंत के बीच, समय और अनंत काल के बीच, बीज और फूल के बीच, वास्तविक और संभावित के बीच, अतीत और भविष्य के बीच का संबंध है।शिष्य केवल अतीत है; गुरु केवल भविष्य है। शिष्य वह सब है जो वह जानता है, और गुरु वह सब है जिसे जाना नहीं जा सकता। जब गुरु और शिष्य के बीच सेतु बनता है, ज्ञात को अज्ञात से, और समय को शाश्वतता से जोड़ता है, तो यह एक चमत्कार है।गुरु पूर्णिमा सभी बुद्धों का दिन है, उन सभी का जो जागरूक हो गए हैं। उनकी याद में जागरूक बनो।”ओशो ने गुरु पूर्णिमा को गुरु और शिष्य के बीच के रिश्ते का प्रतीकात्मक दिन भी बताया। यह शिष्य के मरने और गुरु के रूप में पुनर्जीवित होने का प्रतीक है।ओशो कहते हैं, “शिष्य गुरु में पिघलने लगता है। शिष्य अपने और गुरु के बीच की सारी दूरी मिटा देता है; शिष्य झुक जाता है, शिष्य समर्पण कर देता है, शिष्य अपने को मिटा देता है। वह एक अनस्तित्व बन जाता है, वह एक शून्यता बन जाता है। और उस शून्यता में उसका हृदय खुल जाता है। उस अनुपस्थिति में उसका अहंकार विलीन हो जाता है और गुरु उसके अस्तित्व में प्रवेश कर सकता है। शिष्य ग्रहणशील, असुरक्षित, असुरक्षित होता है; वह सारे कवच छोड़ देता है। वह सारे बचाव के उपाय छोड़ देता है। वह मरने के लिए तैयार होता है। वहीं शिव शंकर संभूति,हाई कोर्ट अधिवक्ता ने कहा अगर गुरु कहता है, “मर जाओ!” तो वह एक क्षण भी इंतजार नहीं करेगा। जबकि सहरसा स्वामी उदय चेतन जी ने कहा गुरु ही उसकी आत्मा है, उसका अस्तित्व है; उसकी भक्ति बिना शर्त और निरपेक्ष होती है। और पूर्ण भक्ति को जानना ही ईश्वर को जानना है। पूर्ण समर्पण को जानना ही जीवन के सबसे गुप्त रहस्य को जानना है।मौके पर डॉ० कविन्द्र,पत्रकार राजकिशोर सिंह,बिक्रम सिंह,शुभम चौहान, शिवम कुमार, डॉ० अरविन्द कुमार वर्मा,पिन्टु पंडित, ब्रजेश विभु, सहरसा से माँ अमृति मुक्ति सहित दर्जनों अनुयायियों ने भाग लिया ।
ज्ञान,ध्यान,हँसो-हँसाओ से मिलती है शांति, अरुण कुमार वर्मा
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