डाॅ.मंजुश्री वात्स्यायन
सहरसा
मां, है कौन ये कृष्ण कन्हैया?
नंद गोप की गाएं चराता
घर-घर से नवनीत चुराता
गोपियों संग है रास रचाता
जग फिर भी उसके गुण गाता।
मृत्यु के फण पर हो आरुढ़
जो करते नर्तन,वही कृष्ण हैं।
हाथ सुदर्शन,संग में जिनके
हरदम मुरली, वही कृष्ण हैं।
शक्तिवान हो माफ करें सौ
अपराधों को, वही कृष्ण है।
सामर्थ्यवान होने पर भी जो
बने सारथी, वही कृष्ण हैं।
स्वयं द्वारिकाधीश किंतु हो
मित्र सुदामा,वही कृष्ण हैं।
बेटा, हैं ये कृष्ण कन्हैया
गाय चरैया, नाग नथैया
रास रचैया, मुरली बजैया
भवसागर से पार लगैया।
—डाॅ.मंजुश्री वात्स्यायन
सहरसा।


