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Wednesday, April 15, 2026

2021 की हार का बदला या भाजपा की पकड़ और मजबूत? नंदीग्राम बना सत्ता की सबसे बड़ी परीक्षा

* नंदीग्राम में फिर सियासी महाभारत: ममता बनर्जी बनाम शुभेंदु अधिकारी, कौन मारेगा बाजी:चंदन चौरसिया*

*जातीय समीकरण, संगठन की ताकत और अंदरूनी कलह—कौन तय करेगा नतीजे की दिशा*

 JNA/कौशल कुमार पटना। वरिष्ट पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में नंदीग्राम विधानसभा सीट अब केवल एक चुनावी क्षेत्र नहीं रह गई है, बल्कि यह राज्य की सत्ता, प्रतिष्ठा और राजनीतिक भविष्य का प्रतीक बन चुकी है। 2026 के विधानसभा चुनाव में यह सीट एक बार फिर पूरे देश की निगाहों का केंद्र बन गई है। राजनीतिक विश्लेषक चंदन चौरसिया के अनुसार, नंदीग्राम का मुकाबला इस बार भी उतना ही भावनात्मक, रणनीतिक और आक्रामक है जितना 2021 में था, बल्कि उससे भी अधिक जटिल हो चुका है। 2021 के विधानसभा चुनाव में इसी सीट पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनके ही पूर्व सहयोगी और अब भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने 1,956 वोटों के बेहद करीबी अंतर से हराकर राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया था। यह जीत न केवल भाजपा के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त थी, बल्कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए एक बड़ा झटका भी साबित हुई थी।
अब 2026 में स्थिति और भी दिलचस्प हो गई है। जहां एक ओर भाजपा अपने संगठनात्मक विस्तार और 2024 के लोकसभा चुनाव में मिले वोट प्रतिशत को अपनी ताकत मान रही है, वहीं दूसरी ओर टीएमसी इस सीट को अपनी “प्रतिष्ठा की वापसी” के रूप में देख रही है। ममता बनाम शुभेंदु: व्यक्तिगत टकराव से राजनीतिक महासंग्राम तक नंदीग्राम की राजनीति अब सिर्फ दलों की लड़ाई नहीं रह गई है, बल्कि यह दो व्यक्तित्वों की टकराहट बन चुकी है—ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी। चंदन चौरसिया के विश्लेषण के अनुसार, ममता बनर्जी के लिए यह सीट भावनात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। नंदीग्राम वही भूमि है, जिसने 2007 के भूमि आंदोलन के बाद उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में एक मजबूत चेहरा बनाया था। यही वह क्षेत्र है जिसने उन्हें “आंदोलन की नेता” से “मुख्यमंत्री” बनने की यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
वहीं शुभेंदु अधिकारी के लिए यह सीट उनके राजनीतिक करियर का टर्निंग पॉइंट है। टीएमसी छोड़कर भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने 2021 में ममता को हराकर यह साबित किया था कि उनका प्रभाव केवल संगठन तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जनाधार भी रखते हैं।
इस बार मुकाबला और भी कठिन हो गया है क्योंकि भाजपा अब केवल शुभेंदु अधिकारी पर निर्भर नहीं है, बल्कि उसने पूरे इलाके में अपना संगठन मजबूत कर लिया है। पंचायत स्तर तक भाजपा की पकड़ ने चुनावी समीकरण बदल दिए हैं। संगठन बनाम जनभावना: कौन पड़ेगा भारी, राजनीतिक विश्लेषण बताता है कि नंदीग्राम में इस बार मुकाबला तीन प्रमुख कारकों पर टिका हुआ है—संगठनात्मक ताकत, जातीय और धार्मिक समीकरण, तथा स्थानीय उम्मीदवारों की स्वीकार्यता।
भाजपा का दावा है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे यहां लगभग 49% वोट मिले, जो उसकी बढ़ती लोकप्रियता का संकेत है। इसके अलावा कई ग्राम पंचायतों पर भाजपा का नियंत्रण भी उसे बढ़त देता है।
लेकिन टीएमसी भी कमजोर नहीं है। पार्टी ने इस बार रणनीति बदलते हुए स्थानीय और पुराने भाजपा नेताओं को अपने साथ जोड़कर “भूमिपुत्र बनाम भूमिपुत्र” का नैरेटिव तैयार किया है। पवित्र चंद्र कर जैसे उम्मीदवार को मैदान में उतारकर टीएमसी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि यह लड़ाई बाहरी बनाम स्थानीय नहीं, बल्कि स्थानीय बनाम स्थानीय है।
चंदन चौरसिया के अनुसार, यह रणनीति मतदाताओं के भावनात्मक जुड़ाव को प्रभावित कर सकती है, खासकर ग्रामीण इलाकों में। जातीय और धार्मिक समीकरण: निर्णायक भूमिका में वोट बैंक
नंदीग्राम की चुनावी राजनीति में जातीय और धार्मिक समीकरण हमेशा निर्णायक रहे हैं। इस क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी संख्या कई बार चुनावी परिणामों को प्रभावित करती रही है। भाजपा जहां अपने हिंदू वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं टीएमसी सभी समुदायों को जोड़ने की कोशिश में लगी हुई है। हालांकि, इस बार मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी और नाम हटाने के आरोपों ने माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया है। विपक्ष का दावा है कि कुछ समुदायों को जानबूझकर प्रभावित किया जा रहा है, जिससे चुनावी संतुलन बिगड़ सकता है।
चंदन चौरसिया के अनुसार, यदि यह मुद्दा चुनाव तक बना रहा तो यह मतदान प्रतिशत और अंतिम परिणाम दोनों पर असर डाल सकता है।  टीएमसी की रणनीति: विकास और जमीनी जुड़ाव पर फोकस
टीएमसी इस बार केवल भावनात्मक राजनीति पर निर्भर नहीं है, बल्कि वह विकास और प्रशासनिक योजनाओं को भी प्रमुख हथियार बना रही है। पार्टी ने स्वास्थ्य शिविर, सेवा केंद्र और स्थानीय सहायता कार्यक्रमों के जरिए लोगों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है। अभिषेक बनर्जी जैसे नेता खुद इस सीट की निगरानी कर रहे हैं, जिससे यह साफ है कि टीएमसी इस सीट को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती।भाजपा की रणनीति: संगठन और सत्ता विरोधी लहर पर दांव, भाजपा का फोकस इस बार पूरी तरह संगठन और सरकार विरोधी नाराजगी पर है। शुभेंदु अधिकारी की रणनीति यह है कि स्थानीय असंतोष और प्रशासनिक मुद्दों को जनता के सामने रखा जाए।
हालांकि, पार्टी के अंदरूनी मतभेद और पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी एक बड़ी चुनौती बन सकती है। चंदन चौरसिया का मानना है कि यदि भाजपा अपनी आंतरिक एकता बनाए रखने में सफल रही, तो वह नंदीग्राम में बढ़त बनाए रख सकती है। वामपंथी और अन्य दल: हाशिए पर लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं
वामपंथी दलों की स्थिति नंदीग्राम में कमजोर जरूर हुई है, लेकिन वे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। सीपीआई और अन्य छोटे दल अभी भी ग्रामीण इलाकों में कुछ प्रभाव रखते हैं, जो वोटों का विभाजन कर सकते हैं।  निष्कर्ष: नंदीग्राम का फैसला सिर्फ सीट नहीं, बंगाल की दिशा तय करेगा।चंदन चौरसिया के विश्लेषण के अनुसार, नंदीग्राम का चुनाव 2026 में केवल एक सीट का परिणाम नहीं तय करेगा, बल्कि यह बंगाल की राजनीतिक दिशा का संकेत भी देगा। यदि ममता बनर्जी यह सीट वापस जीतने में सफल होती हैं, तो यह उनकी राजनीतिक वापसी और पकड़ का बड़ा प्रमाण होगा। वहीं यदि शुभेंदु अधिकारी फिर से जीतते हैं, तो यह भाजपा के लिए बंगाल में स्थायी मजबूती का संकेत होगा। कुल मिलाकर नंदीग्राम एक बार फिर साबित कर रहा है कि यह सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा “मुकाबला मैदान” है, जहां हर वोट इतिहास बदलने की ताकत रखता है।

Prabhu Jee
Prabhu Jeehttp://www.jagdoot.in
ब्यूरो चीफ, खगड़िया (जगदूत न्यूज)
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