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Thursday, April 16, 2026

नीतीश का ‘टाइमिंग गेम’ सत्ता, संविधान और शुभ मुहूर्त के बीच अटका बिहार का राजतिलक, चंदन चौरसिया

*राज्यसभा जीत के बाद भी कुर्सी पर कायम कानूनी पेच या सियासी रणनीति*
*खरमास, गजट और गठबंधन की गणित कब होगा सत्ता परिवर्तन का निर्णायक क्षण*

 JNA कौशल कुमार की रिपोर्ट पटना वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा कि बिहार की सियासत इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां हर सवाल का जवाब “कब” में छिपा है, “क्या” में नहीं। नीतीश कुमार का राज्यसभा के लिए चुना जाना एक सामान्य राजनीतिक घटना हो सकती थी, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उनका बने रहना इसे असामान्य बना देता है। यह सिर्फ पद का सवाल नहीं, बल्कि समय, तकनीक और परंपरा के जटिल संतुलन का खेल है। सबसे पहले बात संविधान की। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 101(2) और “प्रोहिबिशन ऑफ सिमुल्टेनियस मेंबरशिप रूल्स, 1950” साफ तौर पर कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति एक साथ संसद और राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं रह सकता। लेकिन इस नियम का असली ‘ट्रिगर’ चुनाव परिणाम नहीं, बल्कि उसका सरकारी गजट में प्रकाशन है। यही वह कानूनी खिड़की है, जिससे होकर नीतीश कुमार फिलहाल दोहरी भूमिका में सहज बने हुए हैं।यानी, 16 मार्च को राज्यसभा चुनाव जीतने के बावजूद जब तक आधिकारिक गजट जारी नहीं होता, तब तक 14 दिन की समयसीमा शुरू ही नहीं होती। यही कारण है कि नीतीश कुमार अभी भी तकनीकी रूप से सुरक्षित हैं और मुख्यमंत्री पद के साथ-साथ विधान परिषद की सदस्यता का दायित्व निभा रहे हैं। लेकिन राजनीति सिर्फ कानून से नहीं चलती, वह संकेतों और समय की बारीक समझ से भी संचालित होती है। नीतीश कुमार की व्यस्त डायरी इस बात का इशारा देती है कि वे जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेने वाले। रामनवमी के कार्यक्रम, नालंदा विश्वविद्यालय में राष्ट्रपति की मौजूदगी, और मोतिहारी में उपराष्ट्रपति के साथ कार्यक्रम—ये सभी घटनाएं एक “ग्रैंड एग्जिट” की स्क्रिप्ट का हिस्सा प्रतीत होती हैं। इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है खरमास। बिहार और खासकर उत्तर भारतीय राजनीति में धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का गहरा असर रहा है। 13 अप्रैल तक चलने वाले खरमास को शुभ कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। ऐसे में सत्ता परिवर्तन जैसे बड़े राजनीतिक निर्णय को टालना एक रणनीतिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टिकोण से समझदारी भरा कदम माना जा सकता है। यहीं पर भाजपा और जेडीयू की आंतरिक रणनीति भी अहम हो जाती है। सत्ता का हस्तांतरण केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं होता, बल्कि उसमें उत्तराधिकारी का चयन, गठबंधन संतुलन और भविष्य की राजनीतिक दिशा तय होती है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नीतीश कुमार किसी भी कीमत पर अपने राजनीतिक उत्तराधिकार को अस्थिर नहीं छोड़ना चाहते। संकेत साफ हैं कि यह प्रक्रिया “दो किस्तों” में पूरी हो सकती है। पहली किस्त में वे विधान परिषद (एमएलसी) से इस्तीफा देकर राज्यसभा सदस्य के रूप में अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे। दूसरी और अंतिम किस्त में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा तब आएगा, जब उत्तराधिकारी पर सहमति बन जाएगी और समय भी अनुकूल होगा। यह पूरा घटनाक्रम बिहार की राजनीति में “वेट एंड वॉच” की स्थिति पैदा कर चुका है। विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है, तो सत्ता पक्ष संयम के साथ हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहा है। यह एक ऐसा दौर है, जहां हर दिन नई अटकलों को जन्म दे रहा है, लेकिन ठोस जवाब अभी भी गजट नोटिफिकेशन के पन्नों में कैद है। चंदन चौरसिया ने कहा कि आखिर में सवाल यही है कि क्या 30 मार्च तक तस्वीर साफ होगी या फिर 14 अप्रैल के बाद ही बिहार को नया नेतृत्व मिलेगा? इसका जवाब सिर्फ कानूनी प्रक्रिया में नहीं, बल्कि राजनीतिक समझ और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के उस संगम में छिपा है, जिसे नीतीश कुमार बखूबी साधते आए हैं। बिहार की सियासत में यह एक ऐसा अध्याय है, जो बताता है कि सत्ता सिर्फ हासिल नहीं की जाती, बल्कि उसे छोड़ने का समय और तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। फिलहाल, निगाहें गजट नोटिफिकेशन पर हैं क्योंकि वही तय करेगा कि “नीतीश युग” का अगला दृश्य कब और कैसे शुरू होगा।

Prabhu Jee
Prabhu Jeehttp://www.jagdoot.in
ब्यूरो चीफ, खगड़िया (जगदूत न्यूज)
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